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जाता नहीं

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साभार गुगल




आज रंज ओ गम का रंग जाता नहीं
मय -ओ मीना का समा भाता नहीं

मैंने दुनियाँ का चलन सीखा नहीं 
बढ़ कर  मेरा हाथ उसने थामा नहीं

हमसफर कब तू  मेरे साथ साथ था
या गम ए दिल ने तुझे पहचाना नहीं
 
कल तलक सफर में थे मेरे आस पास
आज कोई आवाज़ दे कर बुलाता नहीं

आराधना राय अरु

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ज़द्दोज़हद

पैमाने और  पैमानों  के  ऊपर कसी गई 
                                  जंग और जुऊन ऐसा की बस लड़ गई 

                                   कांच के महलों में ,ये दीवानगी हो गई 
                                   मेरी कहानी हर दरीचे को पता  हो गई 

                                   मैं रूह  थी  मेरा  ना  कोई मक़ाम रहा 
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Tulika ग़ज़ल ,गीत ,नग्मे ,किस्से कहानियों का संसार

                                                                 copyright : Rai Aradhana©
''अना''संक्षिप्त नाम का  उर्दू में अना का मतलब है    selfrespect 
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जन्म

जन्म कहते है दुनिया बहुत छोटी है ,पर फ़िर भी बिछड़े हुए, जब नहीं मिल पाते ,तब हम अपनी तकदीर को कोसते है । छोटी लगने वाली दुनिया अचानक  बड़ी सी लगती है. पर शिशिर जिसे पन्द्रह (15 ) सालों से तलाश रहा था , उसके अचानक मिलने से वो सकपका क्यों गया ? ग्लानि , खेद ,क्षोभ से भर उठा ।  ना चाह कर भी, वही बाते उसके दिमाग मे शोर सा मचा रही थी,   जिन्हें वो भूल जाना चाहता था । कई बार जिन्हें ढूढ़ने के लिए हम बेताब रहते हैं,  जो हमारी ज़िन्दगी की तरह होते है,एक न एक दिन ना मिल पाने की ना उम्मीदी  और वक़्त के साथ आई दूरियों में कही  उनकी यादें धूमिल हो जाती है ,पर अचानक जो हुआ उस के लिए शिशिर तैयार नहीं था ? जो उसे दिखाई दिया , उस से वह कभी भी मिलना नहीं चाहता था , उसे हर शहर -शहर इस लिए नहीं ढूढा  की वो उस से प्यार करता था बल्कि वह  कुछ सुनिचित करना चाहता था, वो सच जो  आज  उसका डर बन गया था । वो समझ ही नहीं पा रहा था ,जो उसके सामने था वो सच है या उस का भर्म पेपर हाथ से छूट कर ज़मीन पर बिखर गए ,आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा मानो  दिमाग ने सोचना बंद कर दिया हो । 

पी. के. ने उस की तरफ देखा "क्या हुआ ,शिशिर…

(हास्य व्यं ग) इश्क -मौहब्बत

तमाम इश्क -मौहब्बत के
अफ़साने अधूरे लगते है।
सीरी -फरहाद , हीर-राँझा,
 सोनी- महिवाल , ससि -पूनो
,रोमियो -जूलियट के फ़साने
 बहाने कि तरह लगते है।
मौत को बहला कर हो
गए वो फ़ना
मौहब्बत के लिए गर वो  जीते तो
बहलाते किस तरह
नून ,तेल लकड़ी में फसी
होती सीरी भी हीर भी सोनी भी
राशन कि लाइन में खड़े होते
फरहाद , राँझे , महिवाल ना जाने  किस तरह
या जुटे होते हरे पत्ते कमाने कि होड़ में
तब सीरी , ससि ,सोनी, हीर , जूलियट
लगी होती जीवन के अजीब -गरीब जोड़ में
अब ये बात सोच कर भी हँसी सी आई है
जीवन के उहा -पोस में मौहब्बत कहाँ बच पाई है।
आराधना राय