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Showing posts from April 23, 2015

जीवन संग्राम

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जीवन संग्राम इस बार भी कहा  हो गया
हर कोई ज़ुल्म का शिकार यहाँ हो गया

ज़द्दोज़हद में झूठ का बोल बाला हो गया
आदमी खून कर के खुद भगवान हो गया

दुराचार , व्यभिचार का शिकार भी हो गया
हर घड़ी , रक़्स , ज़ुल्म सितम यही हो गया

अपनों के सुख दुसरो के दुख देख खुश हो गया 
जहां में हर कोई एक दूसरे से परेशान  हो गया
कॉपी राइट @आराधना राय

खुदी

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होश वालों से ही कहों
जा के ले आओ उसे

जो ज़ुल्म भी न करें
और सितम सहते है

हम हुए खाको नशी
हम दीवाने ही सही
ज़हर खुद पी के फ़ना
आज अब यू ही रोते है

बेखुदी आलम -ए
गुलज़ारी यू रखिए
हम रहे या ना रहे
उसकी खुदी होती है
आराधना राय

हरसिंगार

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व्यक्ति ,सब सहज सरल संबंध पाता  है
ईश्वर भी मानवीय संबधो में ही  होता है।

इतना सहने वाले को देख मन ये रोता है
भावों  में प्यार का सागर लहरा जाता है।

जीवन  प्रणय बन कोई सीखता जाता है
कृष्ण कि राधा बन कर कोई भी आता है।

प्रिय तू मीत और गीत  बन कर आता है
जीवन हरसिंगार सा महक कर आता  है
आराधना राय