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Showing posts from October 28, 2015

यूँ ही

उम्मीदों के उज़ाले में वो हर दिन मिलता है
बड़ी देर तक वो यूँ ही तेरे चेहरे को तकता है
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बात करती है निगाहें  भी तुम्हारी
जब तेरी तस्वीर ख़ामोश होती  है

खुद को भूल जाऊँ  मुमकिन ये है
अब तुझ को भूलाना  मुश्किल है

तेरी वफाओं का सिला क्या दूँगी
ख़्वाब  टूटने का सिला क्या दूँगी

तुम ख़ुदा से चले आये ज़िंदगी में मेरी
तेरे सज़दे खड़ी  हुँ अब भला क्या दूँगी

हज़ारों चराग ये  जल उठे महफ़िल में तेरी
तेरी कही हर बात क़यामत ढाती रही यूँ ही