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Showing posts from November 7, 2015

शहर होने लगे

शहर होने लगे
----------------------------------------- नीम की छाँव तले दिया तुलसी का जले
सूर्ये भी थककर रुके स्वर्णिम साँझ ढले पाखी का गुंजन उत्सव सा लगने लगे
ह्दय का स्पंदन वीणा कि झंकार लगे स्वप्न सात रंगों के झिलमिल करने लगे
मुधु- कि मुस्कान से जब फूल झरने लगे गाँव - मेरे शहर में आकर जब मिलने लगे
दूर- दूर के पाखी मेरे शहर में मिलने लगे मेरा देश जब गाँव से शहर शहर होने लगे
खेत- खलिहान गाँव के वियावान होने लगे आराधना राय "अरु"

माँ

माँ
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ज़िन्दगी तुझ से बिछडी कब मिली
रात के बाद सहर -सहर सी ही मिली जीने के लिए उम्मींद- ए- जहां मिली
तेरे इंतज़ार में रात नम उदास मिली आप से हौसला अजब पा रोशनी मिली
हमने खुद को ही आज़माया बेखुदी मिली ज़िन्दगी से अज़ब जागीर ईमान बन मिली
नींद जब भी मिली हमें पत्थरों पे ही मिली तुझ से बिछड़ कर माँ क्या ज़िन्दगी मिली
ज़न्नत सी ख्वाहिशे तुझ से हज़ार मिली रात में सिलती रही मेरा लिबास उम्मीद मिली
हर ख़ुशी बेलोस सी माँ तुझ से हर घड़ी मिली आराधना राय "अरु"