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माँ

माँ
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ज़िन्दगी तुझ से बिछडी कब मिली
रात के बाद सहर -सहर सी ही मिली
जीने के लिए उम्मींद- ए- जहां मिली
तेरे इंतज़ार में रात नम उदास मिली
आप से हौसला अजब पा रोशनी मिली
हमने खुद को ही आज़माया बेखुदी मिली
ज़िन्दगी से अज़ब जागीर ईमान बन मिली
नींद जब भी मिली हमें पत्थरों पे ही मिली
तुझ से बिछड़ कर माँ क्या ज़िन्दगी मिली
ज़न्नत सी ख्वाहिशे तुझ से हज़ार मिली
रात में सिलती रही मेरा लिबास उम्मीद मिली
हर ख़ुशी बेलोस सी माँ तुझ से हर घड़ी मिली
आराधना राय "अरु"
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महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 

नज़्म

रोज़ मिलती है सरे शाम बहाना लेकर
जेसे अँधेरे में उजालों का फसाना लेकर

चाँद के पास से चाँदनी का खजाना लेकर
मुझको अनमोल सा एक नजराना देकर

मेरा दर दर नहीं कुछ नहीं है क्या उसका
जब भी मिलती है यही एक उलहना लेकर

रात भर कितने आबशार बहा के जाती है
पर वो जाती है तो किस्मत का बहाना लेकर -
आराधना राय

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला