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माँ

माँ
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ज़िन्दगी तुझ से बिछडी कब मिली
रात के बाद सहर -सहर सी ही मिली
जीने के लिए उम्मींद- ए- जहां मिली
तेरे इंतज़ार में रात नम उदास मिली
आप से हौसला अजब पा रोशनी मिली
हमने खुद को ही आज़माया बेखुदी मिली
ज़िन्दगी से अज़ब जागीर ईमान बन मिली
नींद जब भी मिली हमें पत्थरों पे ही मिली
तुझ से बिछड़ कर माँ क्या ज़िन्दगी मिली
ज़न्नत सी ख्वाहिशे तुझ से हज़ार मिली
रात में सिलती रही मेरा लिबास उम्मीद मिली
हर ख़ुशी बेलोस सी माँ तुझ से हर घड़ी मिली
आराधना राय "अरु"
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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय