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Showing posts from December 6, 2015

कविता

कविता
--------------------------------------------------------- दुनिया के बाजार में चंदन नहीं बेचा करती हूँ
दीप से तुलसी वदनं किया करती हूँ तन की ओट में मन का व्यापार नहीं करती हूँ
संबंधों को मन से जीया करती हूँ आँचल, रौली, मौली का खेल नहीं करती हूँ
पूजा- अर्चना से नमन किया करती हूँ नारी की अस्मिता का मान किया करती हूँ
अश्रु को पौंछ जीवन जीया करती हूँ नदियों की धारा अविकल बहा करती हूँ
पत्थरों से निकल आगे राह लिया करती हूँ अरु" सहज नहीं जीवन जीना अरण्य सा
जीवन में हर गीत नया जी कर हँसती हूँ
आरधना राय "अरु"

मंज़र देखा

gugal ke sojany se


मंज़र देखा 
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बेबसी में आस का मंज़र देखा जगह धुँआ -धुँआ सा देखा
आँख में आँसू सा देखा, हर शक्स सहमा हुआ सा देखा
रात के गहरे सन्नाटे में , जहरीली हवा के साये को देखा
सिहरता -कांपता सा मंज़र मौत कि आगेश में लिपटा देखा
उमर कट गई अँधेरे में उन्हें इक रौशनी के लिए तरसते देखा
तमाम उम्र कफस में रह कर बरहा हमने उजालो की ओर देखा
दफ़न मिट्टी में दबी लाशों का अम्बार लगा कर बस तमाशा देखा
जान पर खेल कर इंसान हर तरफ रोता हुआ पूरा -शहर ही देखा
काँपती रूह थी "अरु" लाचारियों का सुबह तक अजब दौर भी देखा
आराधना राय "अरु"