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कविता

कविता
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दुनिया के बाजार में चंदन नहीं बेचा करती हूँ
दीप से तुलसी वदनं किया करती हूँ
तन की ओट में मन का व्यापार नहीं करती हूँ
संबंधों को मन से जीया करती हूँ
आँचल, रौली, मौली का खेल नहीं करती हूँ
पूजा- अर्चना से नमन किया करती हूँ
नारी की अस्मिता का मान किया करती हूँ
अश्रु को पौंछ जीवन जीया करती हूँ
नदियों की धारा अविकल बहा करती हूँ
पत्थरों से निकल आगे राह लिया करती हूँ
अरु" सहज नहीं जीवन जीना अरण्य सा
जीवन में हर गीत नया जी कर हँसती हूँ
आरधना राय "अरु"
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला