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Showing posts from August 6, 2015

नज़्म -जंग सरहदों की

नज़्म -जंग सरहदों की  ------------------------------ ज़ख़्म एक माँ ने भी खाया होगा  दिल उसका भी तो टूटा  ही होगा  बाप कि रूह भी कांप गई यू होगी  कंधो पे जब बेटे को उठाया होगा  किसी के सपने मरे सरहद पे कहीं कहीं तो  आँख में आँसू आया होगा शहीद  कह कर ही पुकारेगा ज़माना  आसमां में कहीं वो मुस्कुराया होगा   गोलियाँ चलती रहेंगी  सरहदों पे यू  कोई उनका भी निशाना बनता होगा  जंग कि कैफ़ियत नहीं होती है कहीं  जो चलाई गई साध कर ही निशाना  ऐसी गोलियों का धर्म होता है कहीं  नहीं ये जानती है हिन्दू , मुसलमान  इनकी भी सरहदे होती है क्या कहीं  करुँ किस बात का ज़िक्र तुझसे "अरु " जंग कैसी भी हो  कोई बेहतरी नहीं होती   आराधना राय   Rai Aradhana ©

अफ़साना

किसका इंतज़ार था तुझे  भी यू ए दोस्त
वह कहकशां भी अपने ही साथ ले के गया

दामन में सिर्फ़ आँसू थे उसकी ही याद के
बीते हुए पल कि वो हर ख़ुशी भी ले के गया

ना जाने किस बज़्म  में तुझे वो अब मिले
वो जाते हुए "अरु "अपनी दास्ताँ कह गया

आराधना राय "अरु"
 Rai Aradhana ©
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शब्द के अर्थ 

बज़्म  -महफ़िल ,Gathering
कहकशां -"Highest place" प्यारा , ब्रम्हांड , 
 दास्ताँ - story , अफ़साना