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Showing posts from June 4, 2015

बात थी

बात  थी 

कुछ अजीब रात थी ,शायद वो पहली मुलाक़ात थी भीड़ में अकेले थे लेकिन  उसकी अलग पहचान थी 
उदास चेहरा पे आँखों में चमक आज भी मुझे याद थी  वो सोचता ज़्यादा था,यही उसकी यही ये खास बात थी 
दुनियाँ के तौर तरीकों से नहीं  कोई उसकी पहचान थी  उसकी पेशानियों पे लिखी यू तो हर रोज़ कि ही बात थी 
अपने दुख  दर्द से उसकी एक ज़माने से कोई पहचान थी   उसकी ख़ामोश निगाहों में   "अरु " अज़ीब सी  बात  थी  आराधना राय  

खालिश

खालिश
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मेरे हिस्से में आई  कड़ी धुप थी
चाँद रातों कि कहीं सौगात न थी

मेरे दामन से भी वो बच कर चला
बदनामी कुछ मेरे साथ कम ना थी

थी खालिश दिल में तेरी ही यादों कि
 बातों कि वो चुभन साथ ही मेरे थी

मेरे  दीवानेपन पर यू ही हंस दिए थे
 इज़ाफा रुसवाई का "अरु" कर रहे थे  

आराधना राय