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बात थी





                            बात  थी 

कुछ अजीब रात थी ,शायद वो पहली मुलाक़ात थी
भीड़ में अकेले थे लेकिन  उसकी अलग पहचान थी 

उदास चेहरा पे आँखों में चमक आज भी मुझे याद थी 
वो सोचता ज़्यादा था,यही उसकी यही ये खास बात थी 

दुनियाँ के तौर तरीकों से नहीं  कोई उसकी पहचान थी 
उसकी पेशानियों पे लिखी यू तो हर रोज़ कि ही बात थी 

अपने दुख  दर्द से उसकी एक ज़माने से कोई पहचान थी 
 उसकी ख़ामोश निगाहों में   "अरु " अज़ीब सी  बात  थी 
आराधना राय  


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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला