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बात थी





                            बात  थी 

कुछ अजीब रात थी ,शायद वो पहली मुलाक़ात थी
भीड़ में अकेले थे लेकिन  उसकी अलग पहचान थी 

उदास चेहरा पे आँखों में चमक आज भी मुझे याद थी 
वो सोचता ज़्यादा था,यही उसकी यही ये खास बात थी 

दुनियाँ के तौर तरीकों से नहीं  कोई उसकी पहचान थी 
उसकी पेशानियों पे लिखी यू तो हर रोज़ कि ही बात थी 

अपने दुख  दर्द से उसकी एक ज़माने से कोई पहचान थी 
 उसकी ख़ामोश निगाहों में   "अरु " अज़ीब सी  बात  थी 
आराधना राय  


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय