Skip to main content

Posts

Showing posts from April 9, 2015

भगवान भी मंदिरों में अब तक बिकता है

भगवान भी मंदिरों में अब तक बिकता  है
दो रूपये में हर दरवाज़े बेमोल  मिलता  है

कहने से भगवान भी कही पर दिखता   है
मांगने पर भी तुझे कहीं  नहीं मिलता है

पीड़ वहन करने पर सब  यही मिलता  है
सह के घात- आघात  मनुज ये  बनता है

आराधना







जिसे  ढूंढ़ते फिरे  दर -  बदर
ना इधर मिले ना उधर मिला

तू खयाल बन के समा रहा
नूर के वज़ूद में  हर रूप में


तुम पूछो

साभार गुगल इमेज़


क्या देखते है हो  अब इन नज़ारों में  जा के कभी  इन परिंदो से तुम  पूछो 
भरी उड़ान दाने पानी कि जब उसने  गिरा क्यों कभी वो  सय्याद से पूछों  
मुकम्मिल कौन सा अब जालिम है
फ़साना जाके किसी और से भी पूछो

मुसल्सल एक बात आकर रोक देती है
बढ़ा के आस क्यों हाथ मेरा रोक लेती है

आराधना