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Showing posts from April 11, 2015

साँझ

दूर कहीं किसी गाँव में
डूबते हुए सूरज के साथ
साँझ रुक सी  जाती  है
पेड़ों से झाँकते पत्तों में
 कुछ वह कह सी जाती है
अंधेरों में मिलने से पहले
अपने  में सिमट जाती है

खामोशी के साथ आँखों से
सब कुछ  कह कर जाती है
पंछियो के कलरव पुकार से
नए रंग रूप भर कर जाती है
सपनों को आवाज़  दे जाती है
सूरज के साथ विदा हो जाती है
आराधना