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Showing posts from May 22, 2015

मुमकिन ना हुआ

मुमकिन ना हुआ
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वो मेरी बात को कभी समझा ना था
वो आईना था मगर दरका हुआ सा

 करुँ क्या बात मैं खुद अपनी ज़ुबाँ से
 किसी कि आस में कब से बैठा हुआ था

 वो मेरा था मगर मुझ से रूठा हुआ था
जाने किस बात ने उसको रोका हुआ था

 परस्तिश कर सकूँ उसको कब हुआ था
 रिश्ता अहसास का जाने क्यों  हुआ था

वो मेरे सामने कभी  यू आया ही नहीं था
निगाहों से करें बातें  मुमकिन ना हुआ था

उसकी मेरी बातें सामने ही कब हो सकी थी
मेरी उसकी हर एक बात पसे दीवार हुई थी  
आराधना राय

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दरका -----चटका हुआ ,
पसे दीवार------------- दीवार के पीछे से।
परस्तिश,,,,,,,,,,,,,,सज़दा , झुकना किसी के आगे
Already published in vishwagatha 2015 jun

ना पाया था

ना पाया था
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वो उसका दर था जहा मैंने सर झुकाया था
ये अलग बात है वो मुझे देख ना पाया था

मेरी  हर बात पहाड़े सी उसे ज़बानी याद थी
ये और बात है मुझे वो कभी कह ना पाया था

मेरे इकरार को इनकार उसने समझ लिया था
उसने मुड़ कर कभी हमें फिर देखा भी नहीं था

मेरी आँखों ने जाने क्यों उसका रस्ता निहारा था
ये और बात है उसे मेरे दिल ने बारहा पुकारा था
आराधना राय