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मुमकिन ना हुआ

मुमकिन ना हुआ
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वो मेरी बात को कभी समझा ना था
वो आईना था मगर दरका हुआ सा

 करुँ क्या बात मैं खुद अपनी ज़ुबाँ से
 किसी कि आस में कब से बैठा हुआ था

 वो मेरा था मगर मुझ से रूठा हुआ था
जाने किस बात ने उसको रोका हुआ था

 परस्तिश कर सकूँ उसको कब हुआ था
 रिश्ता अहसास का जाने क्यों  हुआ था

वो मेरे सामने कभी  यू आया ही नहीं था
निगाहों से करें बातें  मुमकिन ना हुआ था

उसकी मेरी बातें सामने ही कब हो सकी थी
मेरी उसकी हर एक बात पसे दीवार हुई थी  
आराधना राय

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दरका -----चटका हुआ ,
पसे दीवार------------- दीवार के पीछे से।
परस्तिश,,,,,,,,,,,,,,सज़दा , झुकना किसी के आगे
Already published in vishwagatha 2015 jun

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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
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आराधना राय

नज्म

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ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु