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Showing posts from December 22, 2014

मौन

गीतों  के  बोलो  से , निकली  हो जैसे वीणा  की झंकार ,
अश्रु  की धारा से   व्यथित ह्रदय से निकली हो  कोई बात
दुःख ने पहचानी ,  दुःख के  मौन क्रंदन की भी आवाज़
ठहर गया समय , या बीतते पलो ने कह दी अपनी बात
कहानी सी , ढली अश्रुओं से  भीगा ,निकला एक काव्य
स्पंदन रहित  हो हृदय ,करता रहा पुकार बस  बारम्बार
पाती थी दुःख की या छिड़ा था जैसे कोई विहंगम राग
शेष , रह गया ,लालिमा से उष्मित , रंजित आकाश ,
तूलिका उर्फ़ आराधना
copyright rai aradhana rai ©




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