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Showing posts from July 20, 2015

दफ़न

दफ़न हो गए शब्द जब कारखानों में
हसीन पल भी लगे अब क़ैदख़ानों से।

मयस्सर  नहीं  जिस्म को कफ़न  भी
उगलती है आग कहीं भूख दोज़ख की

बंज़र सा इंसान क़ैद है अपनी तड़प में
ख़ुशी भी सिमट गई आज अपने घरों में

कौन सी सज़ा वो किस तरह पा जाता है
"अरु"  वो  शब्दों के मायने बदल जाता है
आराधना राय