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शहर होने लगे

शहर होने लगे
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नीम की छाँव तले दिया तुलसी का जले
सूर्ये भी थककर रुके स्वर्णिम साँझ ढले
पाखी का गुंजन उत्सव सा लगने लगे
ह्दय का स्पंदन वीणा कि झंकार लगे
स्वप्न सात रंगों के झिलमिल करने लगे
मुधु- कि मुस्कान से जब फूल झरने लगे
गाँव - मेरे शहर में आकर जब मिलने लगे
दूर- दूर के पाखी मेरे शहर में मिलने लगे
मेरा देश जब गाँव से शहर शहर होने लगे
खेत- खलिहान गाँव के वियावान होने लगे
आराधना राय "अरु"
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु