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दिन ढले तो रात मेरी रो जाती है

 गोया की ग़ज़ल हूँ खामोश सी रहती हूँ तेरे आस- पास हूँ मगर गुम सी रहती हूँ
दुखतर सा दुख लिए दो शीज़ा कहती हैं रात होते हीदिन की परेशनी है
दिन ढले तो रात मेरी रो जाती है,
जिंदगानी का सफर रो रो कर जीने वालो हँस से दाने चुगते है, मंटो की लिखी किताब हूँ .पाथेर पांचाली भ्रमकीताब हूँ य चंदरबरदाई की गाथा ऐ सनम बता कौन हूँ चंदकांता...............
घात की गहराई रोमियो- जूलियट............................\आराधना राय अरु
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु