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एक नजर मैं भी पाना चाहती हूँ--- गज़ल अपनी पूर कहना चाहती हूँ----------


गीत बन कर लब पे आना चाहती हूँ

मुस्कुरा कर तुझ को पाना चाहती हूँ


चाक दामन कर अपना क्या दिखाऊँ

इश्क़ रब है नहीं आज़माना चाहती हूँ

राज़ ए दिल अपना बताना  चाह्ती हूँ

अश्क तेरे कांधो पर बहाना चाहती हूँ

तेरे आँगन मे दिया अपना जला कर

रोशनी  बन  तिरे घर में आना चाहती हूँ


तेरे सजदे में खुदाया  आकर गिरा हूँ

दुआ बन के लब पे आना चाहती हूँ


सारी दौलत इक तरफ रखकर "अरु"

माँ  के आँसू रोज़  पीना चाहती  हूँ
आराधना राय अरु
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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय