Skip to main content
एक नजर मैं भी पाना चाहती हूँ--- गज़ल अपनी पूर कहना चाहती हूँ----------


गीत बन कर लब पे आना चाहती हूँ

मुस्कुरा कर तुझ को पाना चाहती हूँ


चाक दामन कर अपना क्या दिखाऊँ

इश्क़ रब है नहीं आज़माना चाहती हूँ

राज़ ए दिल अपना बताना  चाह्ती हूँ

अश्क तेरे कांधो पर बहाना चाहती हूँ

तेरे आँगन मे दिया अपना जला कर

रोशनी  बन  तिरे घर में आना चाहती हूँ


तेरे सजदे में खुदाया  आकर गिरा हूँ

दुआ बन के लब पे आना चाहती हूँ


सारी दौलत इक तरफ रखकर "अरु"

माँ  के आँसू रोज़  पीना चाहती  हूँ
आराधना राय अरु
Post a Comment

Popular posts from this blog

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला