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ग़ज़ल गैर मुरदफ ग़ज़ल --- बिना रदीफ कि ग़ज़ल

सखी गीता के नाम



साभार गुगल
     

       उन से हटती नहीं अब मिरी नज़र
       चुभ रही है दिल में कांटे सी गज़र
     
        तिरे गावँ कि छांव को छोड़ कर
          चल पड़े हम अपना मुँह मोड़ कर


         अहले गमों को देख कर रो पड़े
        बिखर गए जज्बात इधर - उधर
     
         रंग बिखर गए हर तस्वुरात के
          तस्वीर बनाई नहीं तिरी दिल हार
   
         जिंदगी चलती रही खामोश इधर
          आ गए साथ मेरे बन कर रहबर  
       
        उन के इकरार कि किसको खबर
        जिनका रोना  भी आता नहीं नज़र
   
         उन से हटती नहीं अब मिरी नज़र
       चुभ रही है दिल में कांटे सी गज़र
     
        डर नहीं जिनको उस खुदा का गर "अरु"
        परिस्तिश करें क्या उन बुतों को इधर-
      आराधना राय "अरु"
   
غزل غیر مرددف غزل --- بغیر ردیف کی غزل
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       چبھ رہی ہے دل میں کانٹے سی گذر
     
        ترے گاو کہ چھاؤں کو چھوڑ کر
          چل پڑے ہم اپنا منہ موڑ کر


         اہل گمو کو دیکھ کر رو پڑے
        بکھر گئے جذبات ادھر - ادھر
     
         رنگ بکھر گئے ہر تسورات کے
          تصویر بنائی نہیں تری دل ہار
   
         زندگی چلتی رہی خاموش ادھر
          آ گئے ساتھ میرے بن کر رہبر
       
        ان کے اقرار کہ کس کو خبر
        جن رونا بھی آتا نہیں نظر
   
         ان سے ہٹتی نہیں اب مری نظر
       چبھ رہی ہے دل میں کانٹے سی گذر
     
        ڈر نہیں جن کو اس خدا کا گر "ار"
        پرستش کریں کیا ان بتوں کو ادھر-
      آرادنا رائے "ار"


   



     
   




   



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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय