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ग़ज़ल--------मुलाकात


    
      साभार गुगल


    तेरी मिरी पहली  मुलाक़ात है
    जिंदगी प्यार कि सौगात है

     कहगे न लब आँखों ने कही
     कुछ कहे अनकहे ज़ज्बात है

     रह गई इन फिजाओ में कहीं
     आधी- अधूरी सी  हर बात है

    बढ़ गयी दुश्वारियाँ मिरी कहीं
    खुद से उलझते हुए ख्यालात है

    चाँद , तारों  की फलक ने कही
     मुड़ के तू  देख कैसी बारात है

    अहले दिल मान जायेगे कहीं
    आज राहों में बिछ रही बिसात है

    दिल को तुझ से निस्बत है "अरु"
    इक नई रिवायत कि शुरुआत है
 आराधना राय "अरु"








    
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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय