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ग़ज़ल--------मुलाकात


    
      साभार गुगल


    तेरी मिरी पहली  मुलाक़ात है
    जिंदगी प्यार कि सौगात है

     कहगे न लब आँखों ने कही
     कुछ कहे अनकहे ज़ज्बात है

     रह गई इन फिजाओ में कहीं
     आधी- अधूरी सी  हर बात है

    बढ़ गयी दुश्वारियाँ मिरी कहीं
    खुद से उलझते हुए ख्यालात है

    चाँद , तारों  की फलक ने कही
     मुड़ के तू  देख कैसी बारात है

    अहले दिल मान जायेगे कहीं
    आज राहों में बिछ रही बिसात है

    दिल को तुझ से निस्बत है "अरु"
    इक नई रिवायत कि शुरुआत है
 आराधना राय "अरु"








    
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु