Skip to main content

कविता अतुकांत

जो नहीं मिला
 उस कि तलाश में सब है
ताश के घर में सब
 के सब बंद है
पुरजे- पुरजे हो कर 
अभी बिखरा है
जोड़ -जोड़ कर पैबंद 
सा सीते है सभी
मर कर भी ख़ुश ही
 इस दुनियाँ मैं
कागजों का व्यापार
 ढूंढते है सभी
सोचते है पैसो से खरीद 
ली दुनियाँ
इश्क़ भी खरीदते है
 वही
ना जाने किसकी
 मजबूरियों को
प्रेम, इश्क, वफ़ा का
 नाम दिया
उसे खरीद कर ना जाने किस 
दिल के साथ खिलवाड़ किया

प्रेम , ढाई शब्दों का ही सही
लेकिन करोड़ों में नहीं बिकता अभी
क्योकि इस दुनियाँ मैं
राधा-कृष्ण सा प्यार नहीं मिलता कभी

आराधना राय "अरु"



जो नहीं मिला वो एतबार ढूंढते है 
अपना खोया हुआ विश्वास ढूंढते है 
Post a Comment

Popular posts from this blog

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला