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नज़्म ------------समाती रही




साभार गुगल


वक्त कि धार पर मैं बहती  रही
वो समुंदर था उसमे समाती रही

दिल कि बातें  तेरी लुभाती रही
हाल  ए दिल  अपना छुपाती रही

गीत लबों से तेरा गुनगुनाती रही
याद आ - आ कर तेरी तडपाती रही

धड़कने दिल कि मेरी बताती रही
 पास हर धड़ी तू है मेरे जताती रही

जिंदगी मौत बन  करीब आती रही
दिल से जां का रिश्ता निभाती रही

ठहरे पानी में अक्स रोज़ देखती रही
बात बनती बिगड़ती अरु देखती रही

आराधना राय "अरु"


وقت کہ کنارہ پر میں بہتی رہی
وہ سمندر تھا اسمے سماتي رہی

دل کہ چیزیں تیری مشابھت اختیار رہی
حال اے دل اپنا چھپاتا رہی

نغمہ لبوں سے تیری گنگناتی رہی
یاد آ - آ کر تیری تڈپاتي رہی

دھڑکنے دل کہ میری بتاتی رہی
  پاس ہر دہی تو ہے میرے جتاتي رہی

زندگی موت بن قریب آتی رہی
دل سے جاں کا رشتہ ادا کرتی رہی

ٹھہرے پانی میں عکس روز دیکھتی رہی
بات بنتی بگڑتی ار دیکھتی رہی

آرادنا رائے "ار"



 









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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु