Skip to main content

नज़्म जिंदगी


साभार गुगल





नज़्म


जिंदगी मेरी ग़ज़ल हुई
तुझसे बिछडने के बाद

रात कि मेरे सहर न हुई
चाँद निकलने के बाद

दिल ने सिर्फ तेरी सुनी
अश्क बार होने के बाद

मर्ज़ मेरा लाइलाज रहा
दिले- बर्बाद होने के बाद

आँच दिल को जलाती रही
दीप की लो बन जाने के बाद

जिंदगी मुझे म्यसर ना हुई
तिरे चले जाने के बाद

सुनी अनसुनी  सब रह गई 
"अरु"  शबे जिंदगी चले  के बाद

आराधना राय "अरु"






Post a Comment

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय