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धुँआ



धुँआ
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धुँआ - धुँआ सी ज़िन्दगी
ना मचल अब के बहार है
खिज़ा की पहल हो चुकी
ना देख जश्न- ए -बहार है
वो तड़प रही ना मकाम अब
ना ही पहले सा वो प्यार अब
तू खुलूसियत के ना जाम भर
दाग से ना दामन चाक कर
जो चमन कली की ना रही
उस पे जां तू ना निसार कर
वक़्त कि मार से सहरा हुआ
वो बाग़ कब यहाँ हरा हुआ
उस पर खिज़ा कि थी नज़र
वो अब के किस के नजर हुआ
 ये जिंदगी धुएं सा  निगल रही
ना मचल के अब तो बहार है
आराधना राय "अरु"





































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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु