Skip to main content

दिल नज़्म





 सौ-सौ किए सवाल दिल -ए  नाशाद कि खातिर
 ढूंढा किए जवाब ख्वाबों कि उम्मीद कि खातिर

 धडकता है ना जाने कितने अहसास लिए दिल
क्या - क्या ना सहा इस में छिपी याद कि खातिर

सब कुछ करीने से सज़ा रखा है जाने किसके लिए
इक दिन बदल जाएगा सब किस सय्याद कि खातिर

शाद हुआ कभी नाशाद हुआ दिल दामन से लिपट कर
दिन साल महीने गिनता रहा किस मीयाद कि खातिर

खाली मकान नहीं रख लिया सामान फिर क्यूँ तिरा
 बताता नहीं कुछ जी रहा है दिल ए बर्बाद कि खातिर

रगों  से होकर ज़िस्म तक खून कि बात कहता है दिल
आवाज़ दे रहा है परिंदों को ''अरु" फरियाद कि खातिर

आराधना राय  ''अरु"
Post a Comment

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय