Skip to main content

नज़्म

तेरे जाने के बाद
तुझसे गिला नहीं
शिकवा,शिकायत
आरज़ू ,बाकी नहीं
पत्थर है दिल नहीं
जिंदगी में जुस्तजू
तेरे सिवा कोई नहीं
आती बहारें लौट जाए
तेरे हसीन मकान से
ऐसा कब हो सका है
किसी चारागार में
जीने के लिए काफ़ी है
मेरी टूटी सी झोपड़ी
तेर फरेबी वादों से
अच्छी है खरी बात
नए मरहले अभी है
इन मरहलों के बाद
आराधना राय "अरु"


Post a Comment

Popular posts from this blog

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु