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क्या देखते हो

क्या देखते हो
ठहरे हुए पानी में क्या देखते हो
गुज़रे वक्त की पेशानी पे क्या देखते हो
छलक जाती है मेरी आँखे क्यों पोछते हो
जुल्म कर जाते हो हर बार मुझ पे
चोट को आकर क्या कभी देखते हो
दर्द पूछा होता ठहर जाने का मुझ से
खो चुकी दरिया की रवानी क्या देखते हो
हँस रहा था सारा ही जहान मुझ पर
मेरी लाचारी को क्यों तूम देखते हो
हँस तो दिए तुम मेरे छाले देख कर
आँखों के मेरे जाले देख कर
किसलिए कुफ्र रोज़ ढाते हो तुम
मंदिर ,  मस्जिद हर रोज़ गिरते हो तुम
आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय