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तुम्हारा


ग़ज़ल
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बे वजह नाम तो मेरा न पुकारा होगा
आपके प्यार का ये एक इशारा होगा

जख्म को मेरे इक तेरा सहारा होगा
अभी भरा है  कभी तो ये  हरा होगा

 दर्द सीने मे उसके भी उठता होगा
  चाँद तन्हा है इक दिन हमारा होगा

 कच्ची मिट्टी के घर मे  गुजारा होगा
 शहर का तुनक मिज़ाज़ ना प्यारा होगा
.
  इन अंधेरों का कोई  तो उजाला होगा
  दर्द सीने का भला किसको गवारा होगा

  माँ का दिल भी दर्द से तड़पा होगा अरु ,
  चोट खा कर जब अश्क उमड़ता होगा

आराधना राय "अरु"


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महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 
कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला