Skip to main content

कहे क्या

कहे क्या वो आज़माने आये है
खुद का जी बहलाने आये है
कहाँ से रंज इतना संग लाये है
बिन पिये ही वो लडखडाये है
किसी सोच से वो टकरा आये है
इक मुद्दत के बाद वो मुस्कुराये है
खुदी का सौदा जब कर आए है
कहे क्या किस बात पर पछताये है
वक़्त की  चाल  देख आए है
आईने से आज क्यों वो घबराये है
बड़े नाज़ से वो  समझाने आए  है
लगा जैसे वो हमारे "अरु "हमसाये है
आराधना राय "अरु"
Post a Comment

Popular posts from this blog

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु