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बदल गए

नज़ारे बदल गए
किस्मत के सितारें बदल गए
कितने चाहने वाले बदल गए
जिंदगी के हाथों वक्त के धारें बदल गए
बंटवारें में घर मिरा लूट लोग निकल गए
आसबाब के साथ घर के लोग बदल गए
चाहत के तूफान उठे दिल में
देख दरिया के साहिल भी बदल गए
रो -रो कर मुझे बुलाने वाले
मेरी मईयत उठा कर बदल गए
बस्ती दर्द और गम की क्या होती
रोतों पे "अरु" मुस्कुरा कर लोग बदल गए
 ©आराधना राय "अरु"
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला