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तो क्या होता



रदीफ- तो क्या होता- काफिया होता, क्वाफी-पता , अता,रहता आता खता
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इश्क ना होता बता तो क्या होता
खुदा सामने होता तो क्या होता
उनकी नज़रों से गिरा तो क्या होगा
संभल कर चलना आता तो क्या होगा
उसका जीना मरना मेरे संग होता
बन कर मुरीद रहता तो क्या होता
बंदगी उसकी तिजारत ना होती
होता वफ़ा का पता तो क्या होता
निगाहों का गिरना उठाना ना होता
उसका करम होता अता तो क्या होता
उस की अंजुमन से उठ जाते क्या होता
सह जाते "अरु" खता"तो क्या होता
© आराधना राय "अरु"
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु