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सुंदर-रूप तुम्हारा

सुंदर- सुमधुर रूप तुम्हारा
सागर जल ममता से हारा
देव आरती क्या मैं कहलाऊँ
सहज सुधा जीवन तुम्हारा
भेद नहीं कहो क्या मैंने जाना
तुमने राम संग जीवन पहचाना
अतुलित परम ही धर्म तुम्हारा
संग- साथ ना रहा कभी हमारा
गर्भरत्न मात्र इक रहा सहारा
क्यों ना दिया तुमने साथ हमारा
आराधना राय "अरु"
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला