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किसी ने नहीं किया

फिलबदी के लिए

आर- काफिया -

प्यार-- इज़हार----इख़्तियार , बहार, एतबार बेज़ार, निसार-शर्मसार,रइंतजा,होशियार


           
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मुझ पर एतबार किसी ने नहीं किया
दिल को बेकरार किसी ने नहीं किया
समंदर ने साथ जब लहरों का किया
तूफां को बेक़रार किसी ने नहीं किया
राह में काँटे चुभे जिगर से खून निकला
इश्क में मिरा इंतजार किसी ने नहीं किया
करूं क्या बात लोगों से बेदिली से अब
मेरी बात का एतबार किसी ने नहीं किया
बात है वादों को दिल से निभाने की
वतन पे जां निसार किसी ने नहीं किया
बड़ी हस्ती है उस महकते गुलशन की
गुलों को शर्मसार,किसी ने नहीं किया
कह दो प्यार उन से किसी ने नहीं किया
"अरु" माँ सा दुलार उन से किसी ने नहीं किया
आराधना राय "अरु"






             
             






               
                 
               


               
               
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु