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हाल ग़ज़ल


    साभार गूगल                  




                           फूल से सुना नग्मा प्यार का
हाल सुना सबा ने इज़हार का
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लम्हा दर लम्हा गुज़रा तूफान का
दिलों के बीच रिश्ता क्या इकरार का
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शज़र पर आफताब बरसा आग का
कितना तवील था मौसम इंतजार का
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सफर सुहाना रहा घटा से मेहताब का
कली ने सीखा तराना दिल के क़रार का
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दिया जलता रहा मेरी टूटी दीवार का
रात भर अश्क बहा उसके इंकार का
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खिज़ा ने किया है रुख ठंडी हवाओं का
नीद में चुनते रहे ख्वाब इसरार का
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वो बनाता रहा बहाना अपने इक्लाक़ का
रास ना आया "अरु" मौसम खार का
आराधना राय "अरु"

                                    
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु