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आवाज़

लिखती तो कविता ही हूँ , आज अपनी ग़ज़लनुमा कविता की बात करती हूँ।
आवाज़
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उन के दरों -दीवार की बातें करें
दिल से दिल मिलाने की बातें करें
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कल तलक रहे बिल्कुल बे- आवाज़
आज उन के दीदार की बातें करें
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ज़मी चुप है,आसमां बड़ा खामोश
सख्त होते हालात की बातें करें
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मातम का होता है बस इक बहाना
शब-ए -गम में क्या मौंत की बातें करें
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हर एक कोई होता नहीं है मेहरबान
बेरहम दुनियाँ की क्या बातें करें
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दुख से मिलकर दुख का बादल छँटता
माँ के आँचल के सकूँ की बातें करें
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भूख से ऊंचा रहेगा सदा ही ईमान
बेबसी, भूख की क्या बातें करें
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हम भी है कायल तेरे ए आसमान
अरु देश के बदहालात की क्या बातें करें
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महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 
कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला