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ईद -

                   





         ईद

ईद से खूबसूरत कहाँ कोई बात होती है
ईद के चाँद में अक्सर कोई बात होती है

रुखसत हुई हो डोली में दुल्हन ही आज
इज़्ज़त से जो हो जाए वहीं बात होती है

बारात सज रही है अर्श पे लगता है आज
हिल - मिल कर ही दिल से बात होती है

रब के होने का अहसास जगाता है  चाँद
जब भी मिलती है रूहानी सी बात होती है

उसी देख कर तारे की अजब रात होती है
फलक पे चाँद की" अरु" नूरानी बात होती है

आराधना राय "अरु"


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय