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तंज़

तंज़
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वो कहते है बात करना छोड़ दो
आपस में रिश्ता रखना छोड़ दो 
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मंदिर में भगवान को पूज कर
मस्जिद में कुरान पढ़ना छोड़ दो
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तलवार मंदिर को करते हो भेंट
मानवता का पाठ पढ़ना छोड़ दो
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बातें अनर्गल करते है रहे वो खुद
इंसान को इंसान कहना छोड़ दो
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खा रहे जो नेता इंसानो को रोज़
वो कहते है मांस खाना छोड़ दो
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हिन्दू से राम मुस्लिम से अल्ल्हा
धर्म से अब मज़ाक करना छोड़ दो
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धर्म की आड़ में मज़हब के नाम पे
हो रहा आतंकवाद अब तो छोड़ दो
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मेरी धरती है स्वर्ग पनपे हज़ारो धर्म
एक दूसरे पर तीर चलना अब छोड़ दो
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गीता पे अंकुश कुरान पे वार जो करे
ऐसे नेताओं को अख़बार में पढ़ना छोड़ दो
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उठ रहा है नींद से अभी तो सारा संसार
मानवता की बात "अरु" करना ना छोड़ दो
आराधना राय "अरु"

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महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 

जन्म

जन्म कहते है दुनिया बहुत छोटी है ,पर फ़िर भी बिछड़े हुए, जब नहीं मिल पाते ,तब हम अपनी तकदीर को कोसते है । छोटी लगने वाली दुनिया अचानक  बड़ी सी लगती है. पर शिशिर जिसे पन्द्रह (15 ) सालों से तलाश रहा था , उसके अचानक मिलने से वो सकपका क्यों गया ? ग्लानि , खेद ,क्षोभ से भर उठा ।  ना चाह कर भी, वही बाते उसके दिमाग मे शोर सा मचा रही थी,   जिन्हें वो भूल जाना चाहता था । कई बार जिन्हें ढूढ़ने के लिए हम बेताब रहते हैं,  जो हमारी ज़िन्दगी की तरह होते है,एक न एक दिन ना मिल पाने की ना उम्मीदी  और वक़्त के साथ आई दूरियों में कही  उनकी यादें धूमिल हो जाती है ,पर अचानक जो हुआ उस के लिए शिशिर तैयार नहीं था ? जो उसे दिखाई दिया , उस से वह कभी भी मिलना नहीं चाहता था , उसे हर शहर -शहर इस लिए नहीं ढूढा  की वो उस से प्यार करता था बल्कि वह  कुछ सुनिचित करना चाहता था, वो सच जो  आज  उसका डर बन गया था । वो समझ ही नहीं पा रहा था ,जो उसके सामने था वो सच है या उस का भर्म पेपर हाथ से छूट कर ज़मीन पर बिखर गए ,आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा मानो  दिमाग ने सोचना बंद कर दिया हो । 

पी. के. ने उस की तरफ देखा "क्या हुआ ,शिशिर…

ज़द्दोज़हद

पैमाने और  पैमानों  के  ऊपर कसी गई 
                                  जंग और जुऊन ऐसा की बस लड़ गई 

                                   कांच के महलों में ,ये दीवानगी हो गई 
                                   मेरी कहानी हर दरीचे को पता  हो गई 

                                   मैं रूह  थी  मेरा  ना  कोई मक़ाम रहा 
                                    ज़र्रे  ज़र्रे  , बिखरी और निखर गई 

                                     देर  से जाना, अपने हिज़र का अंजाम 
                                   सुबह होने तक मैं अपनी ज़बा खुद हो गई 


                                    क्या कहे  "अना" अपनी हम   तुमसे 
                                    खुद रोई मेरी दास्ता   और  फना  हो  गई 


Tulika ग़ज़ल ,गीत ,नग्मे ,किस्से कहानियों का संसार

                                                                 copyright : Rai Aradhana©
''अना''संक्षिप्त नाम का  उर्दू में अना का मतलब है    selfrespect 
from Rekhta in my collection�������…