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छोटी सी बात



साभार गूगल
दिल ही समझे दिल की बात। .....






                                                     छोटी सी बात  (  लधु -कथा  )

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कोई बात नहीं हुई थी , फिर भी लग रहा था की कोई  शीत युद्धचल रहा है। कनक लगभग अपना सामान बाँध चुकी थी , उसने अनमने ढंग से सुकेश से पूछा " तुम्हारा सामान बांध दू या नहीं" ।

"नहीं " अख़बार एक तरफ फेक कर उसने दो टूक उत्तर दिया।  कनक को जैसे मालूम था , की सुकेश क्यों उस के मायके उस के साथ नहीं जा रहा बोलना बहुत कुछ चाहती थी मगर बोली नहीं, मन मसोस कर सामान लगाती रही। पता नहीं सुकेश को साथ न देख क्या बोले माँ बाबूजी , मन ही मन वो भयभीत होती रही।
 बड़ी देर तक खुद ही अपने माँ बाबूजी की कल्पना कर प्रश्नों के  उत्तर देती रही।

टिकट रखने से लेकर , घर का  बिखरा सामान लगाने तक , कनक खुद को ही कोस रही थी ,और करो प्रेम - विवाह कनक ,ऐसा ही होगा तुम्हारे साथ ,अब माँ - बाबूजी को दोष देती हुई ,मायके थोड़ी ही जा सकती थी। विवाह तो किया अपन ही मन से न , फिर रोना कैसा झेलो। एक ही तो बहन है उसकी शादी में न जाऊँ तो फिर भी माँ - बाबूजी की हँसी उड़ेगी , और पति के बिना पहुँची तो , लोग हँसी उड़ायेंगे। कनक को कुछ सूझ ही नहीं रहा था। माँ का कॉल आया था , लड़के वाले बहुत बड़े घर के है ,एक नज़र में ही कोमल को पसंद कर गए, "तूने अपने मन से ना की होती तो तेरे लिए कम अच्छे घर के रिश्ते आ रहे थे," ऐसे गिरे पड़े भी नहीं थे की तेरी शादी धूम - धाम से ना कर पाते।माँ की बात बुरी तो बहुत लगी पर वो चुप ही रही। वो जानती  थी की उसके घर वाले सुकेश को पसंद नहीं करते है , कारण उस का मिडिल क्लास होना है और कुछ नहीं। एक हफ्ते से पीछे पड़ी थी , बहन की शादी है , खाली हाथ थोड़े ही न जाऊँगी, कम से कम सोने की चेन  तो बहन को दूँगी न , मुँह चढ़ा कर  सुकेश ने कहा था, "इतने रूपये होते तो अम्मा को कमरे की छत बनवाने के लिए न  दे देता ".। अगले दिन जा कर वो सिल्क की साड़ी खुद ही ले आया था। लाये भी तो ऐसी साड़ी न ज़री का काम है न पल्ला ही भरी है , ऐसे से तो ना लाते, पता है  कितने अमीर लोगो में जा रही है कोमल , वो ख़ुशी के मारे बोलती जा रही थी। तुम लोगो की तरह नही है उस के ससुराल वाले। वो अपनी ही रौ में कहे जा रही  थी , भूल गई थी , पुरुष का मन रूपये पैसे के तकाज़े से ही आहात होता है। सो सुकेश टिकट लाया भी तो सिर्फ कनक के लिए , "अब तुम कपडे लत्ते बनवाने को कहोगी, वो में बनवाने वाल नहीं हूँ तो बैक में क्लर्क  ही ना, " बात पूरी कर के सुकेश कमरे से बाहर निकल गया ।

बात कुछ भी नहीं थी पर दोनों के अहम ने उसे बड़ा बना दिया था। सामान बांध कर कनक जाने के लिए तैयार होने लगी , अचानक उसके हाथ में,एक ऑफिशियल मेमो पड़ा ,  ऑफिस से ज़्यादा छूटी ले ली थी इस कारण  अगले महीने उसे आधी तनख्वाह पर रहना था। गलती कनक जानती थी , सुकेश  क्लार्क है वो जानती थी   शादी हुई ,बिना किसी खर्चे के ,  उसकी सास माँ से भी अच्छी है ,फिर क्यों इतना सुना डाला उसने ?
 धीरे -धीरे उसने बंधा हुआ सामान खोल डाला। सुकेश को खाना बनने आता  ही कहा है अब बेकार में एक हफ्ते होटलों में खायेगा, रूपये की बर्बादी अलग ,सुकेश है भी थो सब से अलग वो चाहे जितना प्रताड़ित हुआ हो पर उसने कनक को कभी दुःख का अहसास भी होने नहीं दिया था।  इस बीच उसे पता ही नहीं चला की सुकेश कब का आ कर कमरे में खड़ा है और उसे रोता देख रहा है , बिना कहे ही जैसे दोनों एक दूसरे की बात समझ गए।
 बहुत समय से उसके रिश्तों पर पड़ा कुहासा हट गया था।

  आराधना राय "अरु "
  Rai Aradhana ©,
  
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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
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दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय