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रंज़

   


रंज़ मेरा था मेरा, मेरे ही साथ रहा
उम्र भर आह कि वो ही सौगात रहा

दफ़न हो गए होते हम यूँ यहीं कहीं
अब के ज़माना भी मेरे ही साथ रहा

वो कहे रात तो रात ही बस मेरी सही
गमों का सौदा था हमनें  हँस के सहा

जानें कौन बिज़लियाँ रोज़  गिराता रहा
 ज़मी पे "अरु"अजब सा कुफ़्र ढाता रहा
आराधना राय "अरु "
Rai Aradhana ©
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कुफ़्र =attitude of ingratitude and thanklessness मतलबी ,ज़िस पर ईश्वर कि  कृपा ना हो 
                                   











                                      
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला