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कौन सी बात

        







साभार गूगल 
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          कौन सी बात
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रोप बबूल को आम की बात की
कर्म-विधान की कौन सी बात की
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जल रहा था देश, पेट की आग से
मंदिर जला, मस्जिद को तोड़ कर
जाने किस की ख़ुदा की तलाश की
हृदय पे मरहम लगा नहीं जो सकते
क्यों फिर बस देह- सुगंध की बात की
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जली सैकड़ों ही बस्तियाँ क्या बात थी
हम ने जाने किस सभ्यता की बात की
पशु की नहीं पशुता से नीची ये बात की
क्रांति पे "अरु" अशांत हो कर ही बात की 
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आराधन राय "अरु "
Rai Aradhana ©
स्वरचित

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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु