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आवाज़

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नाकाम उम्मीदो का ज़नाज़ा लेकर 
हसरतों को हम क्यू यू ढूँढ़ते ही रहे 

बड़ी खामोशियाँ थी तेरे ही शहर में 
कौन सा शोर था जिसे झेलते ही रहे 

नादानियों के शहर में बर्बादी ये हुई 
आवाज़ थी सभी कि जी तोड़ती रही

शीशे तमाम टूट गए मेरे ही मकान के 
कौन सी शये थी"अरु" भटकती ही रही

आराधना राय 
 Rai Aradhana ©  
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नज़्म

रोज़ मिलती है सरे शाम बहाना लेकर
जेसे अँधेरे में उजालों का फसाना लेकर

चाँद के पास से चाँदनी का खजाना लेकर
मुझको अनमोल सा एक नजराना देकर

मेरा दर दर नहीं कुछ नहीं है क्या उसका
जब भी मिलती है यही एक उलहना लेकर

रात भर कितने आबशार बहा के जाती है
पर वो जाती है तो किस्मत का बहाना लेकर -
आराधना राय

महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 

नज़्म

उम्र के पहले अहसास सा
कुछ लगता है
वो जो हंस दे तो रात को
 दिन लगता है

उसकी बातों का नशा
आज वही लगता है
चिलमनों की कैद में वो
 जुदा  सा लगता है

उसकी मुट्टी में सुबह बंद है
शबनम की तरह
फिर भी बेजार जमाना उसे
लगता है

आराधना