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आहट





तेरे कदमों की आहट पता मेरा क्यों बताती है
चले हो साथ मेरे तो निगाहों में बसें ही रहना

मेरे दिल के आईने मैं रोज़ चमकती ही रहना
कहीं भी धूल मिल जाए तो साफ करते रहना

बहुत आसान है किसी से भी प्यार यूँ कर लेना
 मुश्किल है किसी के गुनाहों को माफ कर देना

मेरी दुनियाँ, तेरी दुनियाँ की बातें पूछते रहना
अजब से कायदें कानूनों की 'अरु ' कैद में रहना  
आराधना राय  'अरु'

नोट - ये नज़्म  मैंने ख़ुद  को एक पुरुष ------आदमी  मान कर  लिखी है 
पता नहीं कितनी क़ामयाब  हुईं हूँ , स्त्री  होकर पुरुष कि भाषा बोलने में 
ये आप बतायेंगे।   
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला