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सितम
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खुल गए रास्ते ,बात अब सब आम हुई
यूँ ही झंडे पकड़ हाथ में अब हड़ताल हुई

देखों जिसे चेहरा ही अजब लिए फिरता है
भीड़ में आदमी दीवाना सा क्यों लगता है

हर एक शख़्स तुला है अपनी ही कहने को
बिसात पे रखा हुआ  प्यादा सा ही लगता है

रोज़ बढ़ जाती है गरीब कि लड़की की तरह
बढ़ती मँहगाई दिनों दिन ये भी क्या खूब है

गरीब कि थाली भी  खाली ही रहने वाली है
रोटी की बातें फैशन सा सितम ढाने वाली है

ग़रीब की दुआओ का इनाम कोई यूँ  ले गया
दवा के नाम पे 'अरु' कैसा वो दर्द साथ ले गया

आराधना राय "अरु"  


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ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में लग गई आग सारे जमाने में लगेगी सदिया रूठो को मानने में अजब सी बात है ये दिल के फसाने में उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में आराधना राय 

राहत

ना काबा ना काशी में सकूं मिला दिल को दिल से राहत थी जब विसाल -ए -सनम मिला। ज़िंदगी का कहर झेल कर मिला बीच बाज़ार में खुद को  नीलम कर गया यू  हर आदमी मिला राह में वो इस तरह कोई चाहतों से ना मिला रूह बेकरार रहे कोई "अरु" और वो अब्र ना कभी हमसे यू मिला आराधना राय copyright :  Rai Aradhana  ©

नज़्म

 उम्र के पहले अहसास सा कुछ लगता है वो जो हंस दे तो रात को  दिन लगता है उसकी बातों का नशा आज वही लगता है चिलमनों की कैद में वो  जुदा  सा लगता है उसकी मुट्टी में सुबह बंद है शबनम की तरह फिर भी बेजार जमाना उसे लगता है आराधना