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चुभन





सलीक़े  से उठे बैठे बुज़ुर्गो की ये सब  हिदायत थी
करीने से संभाले घर माँ की उम्र भर ये ताक़ीदें  थी

नज़रों  को झुका ही घर से वो बाहर ही निकली थी
कोई शीशा था चुभा ऐसा की मेरी जां ही निकली थी

लबों पे मुस्कराहट ऐसी कि दिलों को बहलाती थी
बड़ी ही कैफियत दे कर ख़ुद को सम्हाल लेती थी

न जाने क्यों गुलिस्तां को फिर किसी ने उजाड़ा था
माँ के आंसुओ  ने रो कर दिल को फिर सम्हाला था

ना मालूम क्यूँ  माशरा ये  दुख्तर को ही यूँ रुलाता है
लड़कों को माशरा "अरु " कब  ये सबक़ सिखलाता है
आराधना राय "अरु"
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माशरा- society , समाज़ 

दुख्तर - girl  , लड़की 

चुभन 
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला