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آرزو आरज़ू

साभार गूगल

तज्दीद-ए-आरज़ू
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जिसे भूले ही नहीं याद क्या उसको करें
उसकी हर बात दिल में ही बसा रखी है

हर लम्हा उसे सोचते ही गुज़रता रहा यूँ
जैसे सहरा से कोई आबशार हो निकला

उसकी बातें में तज्दीद-ए-आरज़ू है तेरी
उसका ज़िक्र 'अरु' लगता है फरिश्तों सा

आराधन राय 'अरु '
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Renewing desire- तज्दीद-ए-आरज़ू, इच्छा,



       آرزو  
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جسے بھولے ہی نہیں یاد کیا اس کو کریں

اس کی ہر بات دل میں ہی حل رکھی ہے

ہر لمحہ اس خیال ہی گزرتا رہا یوں
اس کی باتیں میں تجدید-اے-آرزو ہے تیری
جیسے صحرا سے کوئی آبشار ہو نکلا
اس کا ذکر 'ار' لگتا ہے فرشتوں سا
آرادن رائے 'ار'

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महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 

नज़्म

रोज़ मिलती है सरे शाम बहाना लेकर
जेसे अँधेरे में उजालों का फसाना लेकर

चाँद के पास से चाँदनी का खजाना लेकर
मुझको अनमोल सा एक नजराना देकर

मेरा दर दर नहीं कुछ नहीं है क्या उसका
जब भी मिलती है यही एक उलहना लेकर

रात भर कितने आबशार बहा के जाती है
पर वो जाती है तो किस्मत का बहाना लेकर -
आराधना राय

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला