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सखी मित्र




     

       सखी ,मित्र
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 सुधियों के आँगन में मुस्कुराता है
 गीत सा कोई यू ही गुनगुनाता है

 उर में जो वह बसा कब का  हुआ है
मेरे संग ही तो वह प्रतिपल रहा  है

सखी तुम्हारी स्मृति सा वह यू तो है
प्रेम तुम्हारा उसमें ही अब साकार है

स्वपन का कोई वो नया सा आकाश है
ना जाने किस रीत का वह ही आधार है

प्रणय -सिंधु सा है वो ही अचल हुआ है
प्रीत कि धरोहर हिय में ही सजल हुआ है

मित्रता के क्षितिज पे वह हर्षित हुआ है
"अरु "नयनों में वो ही तो छाया हुआ है
आराधना राय
 Rai Aradhana ©






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नज़्म

रोज़ मिलती है सरे शाम बहाना लेकर
जेसे अँधेरे में उजालों का फसाना लेकर

चाँद के पास से चाँदनी का खजाना लेकर
मुझको अनमोल सा एक नजराना देकर

मेरा दर दर नहीं कुछ नहीं है क्या उसका
जब भी मिलती है यही एक उलहना लेकर

रात भर कितने आबशार बहा के जाती है
पर वो जाती है तो किस्मत का बहाना लेकर -
आराधना राय

महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 

जन्म

जन्म कहते है दुनिया बहुत छोटी है ,पर फ़िर भी बिछड़े हुए, जब नहीं मिल पाते ,तब हम अपनी तकदीर को कोसते है । छोटी लगने वाली दुनिया अचानक  बड़ी सी लगती है. पर शिशिर जिसे पन्द्रह (15 ) सालों से तलाश रहा था , उसके अचानक मिलने से वो सकपका क्यों गया ? ग्लानि , खेद ,क्षोभ से भर उठा ।  ना चाह कर भी, वही बाते उसके दिमाग मे शोर सा मचा रही थी,   जिन्हें वो भूल जाना चाहता था । कई बार जिन्हें ढूढ़ने के लिए हम बेताब रहते हैं,  जो हमारी ज़िन्दगी की तरह होते है,एक न एक दिन ना मिल पाने की ना उम्मीदी  और वक़्त के साथ आई दूरियों में कही  उनकी यादें धूमिल हो जाती है ,पर अचानक जो हुआ उस के लिए शिशिर तैयार नहीं था ? जो उसे दिखाई दिया , उस से वह कभी भी मिलना नहीं चाहता था , उसे हर शहर -शहर इस लिए नहीं ढूढा  की वो उस से प्यार करता था बल्कि वह  कुछ सुनिचित करना चाहता था, वो सच जो  आज  उसका डर बन गया था । वो समझ ही नहीं पा रहा था ,जो उसके सामने था वो सच है या उस का भर्म पेपर हाथ से छूट कर ज़मीन पर बिखर गए ,आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा मानो  दिमाग ने सोचना बंद कर दिया हो । 

पी. के. ने उस की तरफ देखा "क्या हुआ ,शिशिर…