Skip to main content

सखी मित्र




     

       सखी ,मित्र
-------------------------------------
 सुधियों के आँगन में मुस्कुराता है
 गीत सा कोई यू ही गुनगुनाता है

 उर में जो वह बसा कब का  हुआ है
मेरे संग ही तो वह प्रतिपल रहा  है

सखी तुम्हारी स्मृति सा वह यू तो है
प्रेम तुम्हारा उसमें ही अब साकार है

स्वपन का कोई वो नया सा आकाश है
ना जाने किस रीत का वह ही आधार है

प्रणय -सिंधु सा है वो ही अचल हुआ है
प्रीत कि धरोहर हिय में ही सजल हुआ है

मित्रता के क्षितिज पे वह हर्षित हुआ है
"अरु "नयनों में वो ही तो छाया हुआ है
आराधना राय
 Rai Aradhana ©






Post a Comment

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय