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उम्र गुज़री عمر گزری





साभार गूगल

उम्र शिकवे शिकायत में गुज़री
बात कहते सारी रात ही गुज़री

कौन आग लगता रहा पानी में
सहर तो यूँ दामन बचाते गुज़री

ग़ुम गए वो सारे ख़्यालात कही
जिनको ढूँढ़ते ये ज़िन्दगी गुज़री

दुनियाँ तेरे बाजार में सौदाई सही
आब आँखों में लिए राह ये गुज़री

ये आँसू भी ग़वारा ना हुए ना सही
लबों पे हँसी भी 'अरु ' जां से गुज़री

आराधना राय 'अरु '
                                                                                                                                                               
عمر شکوے شکایت میں گزری
بات کہتے ساری رات ہو گزری
کون آگ لگتا رہا پانی میں
سحر تو یوں دامن بچاتے گزری
غم گئے وہ سارے خیالات کہی
جن ڈھوڑھتے یہ زندگی گزری
دنیا تیرے مارکیٹ میں سودائی 
آب آنکھوں میں لئے راہ یہ گزری
ارادھنا رائے 'ار'

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय