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बेवज़ह






जाने कौन बात कर गया था कहीं
कैसा वादा था कर  गया था कोई

बेवज़ह ही सताता रह गया था कहीं
ख़ुदा भी मुस्कुरा कर रह गया कोई

वो कौन था तेरे मेरे दरम्यां ही कहीं 
हर बात पे रंज सताता रहा यू कहीं 

परखा हर कसौटी पे ज़माने ने कहीं 
मेरी अना ही टूटी उस परख में कहीं 

बड़ी हसरतों का ज़नाज़ा उठा यू कहीं 
खाक़ कर  "अरु" बातें बनाता रहा कहीं 

आराधना राय 
Aradhana © 
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बेवज़ह- Meaning less. बिना बात 
अना- -Self- respect,  स्वाभिमान 
दरम्यां-middle/midst/interval, in-between" in ... बीच में 


  

तेरी मानिंद ही है, झील सा गहरा नफ़ासत वाला 
इस ज़माने से ही अलग सा  कहीं वो दिखने वाला 



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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय