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सवालात

 एहतमाद के काबिल ना थे उनका ख्याल किए
 दिलों में नश्तर चुभा के सौ  सवालात किए

तेरी पनाह में झुक कर सज़दे  हज़ार किए
उससे जीने के वादे  हमने हज़ार किए

वफ़ा कि बातें  हमारी ज़ानिब से  बार-बार किए
क़त्ल कि रात हर लम्हा हमारा इंतज़ार किए

उसी के नाम का सदका हज़ार बार किए
उसी को खुदा मान कर सौ- सौ काम किए

अज़ीम ग़ैरत  रही  जिन्होंने  सवालात किए
अज़ीब बात है "अरु " तुझसे हर सवाल किए  
आराधना राय


copyright : Rai Aradhana ©
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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय